Monday, July 20, 2015

ये कैसा सावन


     

  विषय - सावन
विधा- स्वतंत्र


ये कैसा सावन आया
कोई तो झूले झूला
कोई छुपाये बदन अपना
फटे गीले कपड़ो में
रंग बिंरंगी इस दुनिया के
रंग हैं बड़े अनोखे
एक खाये घेवर तो
एक रोटी को तरसे
बहकाया मन कईंयो का
सावन ने
सकपकाये कई 
देख टपकती छत को
सावन तो सावन है 
अमीर लें आनंद मधुर फुहार का
गरीब सोने भी को तरसे
सावन के गीत गाती
झूला झूलती कुमारियाँ
सर छुपाने को तरसे
गीत कहाँ,निकले आंसू आंखो से
देख कर बिमार बच्चो को
और देख टपकती झोंपड़ियाँ
भीगते निगोड़े सावन में
देख गीली कचीली सड़के
कहीं मन महके सौंधी सुगंध से
कहीं आयें आंसू
झोपड़ीयो में गंदगी की दुर्गंध से
सावन तो सावन है
आता है और जाता है
बस किसी को खुशियाँ
किसी को गम दे जाता है

4 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, यारों, दोस्ती बड़ी ही हसीन है - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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