Monday, November 17, 2014

तुम्हारा ख्याल

ख्याल

अँधेरी रातो में चलती आंधियां

बुझते हुए दीयों में ख़तम होता तेल

डरावनी हवाओं की आवाज़े

डर को भगा जाती हैं

जब भी ऐसे में जब आता है

तुम्हारा ख्याल

इक दिया सा मन में जल उठता है

सड़क पर घूमते दरिन्दे भी

तब डरावने नहीं लगते

जब मन में हिम्मत बंधा जाता है

तुम्हारा ख्याल

तुम दूर हो कर भी पास हो

जानती हूँ तुम हकीकत नहीं बस एहसास हो

तब भी मन को धीरज बंधा जाता है

तुम्हारा ख्याल

गर तुम पास होते तो

शायद कुछ अलग हालात होते

तब मन में इतनी हिम्मत न होती

मैं भी इक कमज़ोर सी नारी ही होती

लेकिन ये तुम्हारा है एहसान

की मैं मज़बूत हूँ डरपोक नहीं

नारी होकर भी कमज़ोर नहीं

एहसान है बहुत की सदा साथ देता है

तुम्हारा ख्याल

ये बेवफा नहीं की साथ छोड़ जायेगा

रहे वफ़ा में हमें तनहा छोड़ जायेगा

ये तो वादे का पक्का है

सदा साथ रहता है मेरे

तुम्हारा ख्याल

4 comments:

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    1. हार्दिक आभार उपासना

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  2. एक ख्याल ही काफी होआ है कई बार ...

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    1. सहमत ....दिगम्बर जी ...आभार

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