Wednesday, July 9, 2014

बर्फ का गोला




        बरफ के गोले जैसी

कुछ मीठी
कुछ खट्टी
कुछ पिघलती सी
ज़िदगी
गरमी में जल्ती धूप
रेगिस्तान में 
पानी के छलावे सी
ज़िदगी
रोज़ रोज़ 
कुछ तोड़ती
कुछ नया जोड़ती
ज़िदगी को
जीना भी 
बर्फ के गोले सा है 
एक एक बूंद
चूसते हुये भी 
पिघलती ज़िंदगी

14 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (11.07.2014) को "कन्या-भ्रूण हत्या " (चर्चा अंक-1671)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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    1. आभार राजेंद्र जी

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  2. सुन्दर बिम्ब लिए सटीक अभिव्यक्ति

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    1. हार्दिक आभार मोनिका जी

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    1. हार्दिक आभार राजीव जी

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  4. खट्टी मीठी चटपटी लेकिन पिघलती .. जिंदगी की बढ़िया बिम्ब प्रस्तुति

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    1. हार्दिक आभार कविता जी

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  5. वाह !!! बहुत ही सुंदर एवं सारगर्भित रचना...

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