Saturday, February 22, 2014

यादें


    
    यादें कब जीने देती हैं 


यादें तो जीने के लिये होती हैं


कौन भूला है इन यादों को


कौन भुला पाया है इन यादों को


कौन बच पाया है इन यादों से


यादें जीने का सहारा होती हैं


यादें न हों तो जीना बेकार होता है


याद न करो इन यादों को 


यादें ही जिंदगी को मार डालती हैं


यादें ही जीवन को नया मोड़ देती हैं 


याद करो इन्हे प्यार से तो


सपनो में भी साथ रहती हैं यादें


याद करो गर रोकर इन्हे तो 


जीना मुहाल कर देती हैं यादें 

7 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (23-02-2014) को " विदा कितने सांसद होंगे असल में" (चर्चा मंच-1532) पर भी होगी!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. हार्दिक आभार शास्त्री जी

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  2. हाँ, ऐसी ही होती हैं यादें

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  3. यादें .... जीने के लिए और जीने का सहारा भी होती हैं ... इन्हें रोकना मुमकिन नहीं ...

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