Tuesday, July 30, 2013

फूलो जैसा बनो

फूल


आज फूलो को भी पसीना आ गया

ऐसा क्या हुआ होगा

फूलो के ज़ज्बातो को कोई नहीं समझता

खुद ही रोते हैं और सुख जाने पर भी खुशबू  देते हैं

और कोई ऐसा कर के दिखाए तो जाने

बस फूल ही हैं ऐसे जिन्हें चाहे पैरो तले कुचल दो

चाहे गुलदान में लगा दो या चाहे किताबों में सुखा दो

ये तो सदा खुशबु ही देंगे

गले में हार डाल दो या सेज पर सजा दो

ये बदनसीब तो अर्थी को भी खुशबु देते हैं

आज की दुनिया ने इंसान इंसान का गला कटता है

फूलो जैसा बनना तो दूर की बात है

 

17 comments:

  1. आज फूलो को भी पसीना आ गया
    ऐसा क्या हुआ होगा
    फूलो के ज़ज्बातो को कोई नहीं समझता
    खुद ही रोते हैं और सुख जाने पर भी खुबू देते हैं

    शुभ प्रभात
    इसको एडिट करें
    खुबू को खुशबू करें
    सादर

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार (01-08-2013) को "ब्लॉग प्रसारण- 72" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

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  3. आज की दुनिया ने इंसान इंसान का गला कटता है

    फूलो जैसा बनना तो दूर की बात है

    बहुत खुबसूरत अभिव्यक्ति !
    latest post,नेताजी कहीन है।
    latest postअनुभूति : वर्षा ऋतु

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  4. गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं,काँटों से भी जीनत होती है.....
    जीने के लिए इस दुनिया में गम की भी ज़रूरत होती है.....

    फूल न सही काँटा ही बनो :-)

    सुन्दर भाव रमा जी
    अनु

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  5. फूलों का जवाब नही ,बिना शर्त खुसबू बाटंते फिरते हैं |
    एक शाम संगम पर {नीति कथा -डॉ अजय }

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  6. भावपूर्ण प्रस्तुति रमा जी

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  7. बहुत सुन्दर

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