Saturday, May 19, 2012

बिखर गई

खत्म होने लगा अब दियों का तेल
जल गई बाती भी सारी
तुम ने खबर न ली अब तक
राख हो गई मैं भी सारी
दिया न जल पाएगा अब उम्मीद का
आस ही टूट गई अब तो हमारी
तुम्हे दिल दिया था नाजुक सा अपना
वो तो कदमो तले कुचल गया दुनिया के
तुम्हारी भी क्या गलती इस में
नजर नही आई थी हमें ये
स्वार्थो भरी भीड़ सारी
दुनिया कितनी दो रंगी है नही पता था
अब जानकर क्या करेंगे हम
जब निकल गई अरमानो की अर्थी सारी
कहाँ से लाऊं अब हिम्मत इंतजार की
अब तो बिखर गई मैं ही सारी

6 comments:

  1. बेहद मार्मिक भाव और साथ में चित्र भी .........बहुत खूब सखी रमा

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    1. हार्दिक धन्यवाद उपासना सखी ..................

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  2. Bahut Bhavpooran rachna hai ....

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    1. हार्दिक धन्यवाद मंजुल सखी ...

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  3. bikhrne na dijiye in ummido ko.....
    kahte hai har raat ke baad ek savera hota hai....

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    1. सही कहा है तुमने गौरिका .....आभार

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