Saturday, July 25, 2015

आंसू



   

भरे बादल बरसे जब जब
बरसे मेरेआंसू तब तब
याद आई परदेसी बेटे की
नौकरी करवाये यहाँ सब कुछ
जब तू पास था
बारिश का मतलब ही और था
आंगन में कीचड़ सने पैर
और तेरी हुड़दंग 
अब सब सूना है
आंगन में बरसता पानी
बह जाता है चुपचाप
कोई नहीं चिल्लाता अब
बस हिचकियों का बाँध टूट जाता है
बरसते बैं आंसू
कोई इन्हे पोंछने नही आता है
न कोई माँ माँ पुकारता
आंचल से मुंह पौंछ जाता है
पिता भी तेरे रहते हैं बैठे
इक कुर्सी पर चुपचाप
छुपा कर चेहरा अखबार में
पौंछ लेते हैं अपने आंसू 
देख न लूं कहीं मैं
इस कारण उनके आंसू भी
पूरी तरह बह नही पातें हैं
तुझ बिन सूना हो गया घर सारा
हम बूड़ो का तो तू ही है सहारा
पर मजबूरियाँ सब करवाती हैं
नौकरियाँ कब छोड़ी जाती हैं
सुखी रह जहाँ भी रह
दिल से यही दुआ आती है
इसके साथ ही इक हाथ उठता है 
और खुद ही आंसू पौंछ जाता है

2 comments: