Tuesday, May 6, 2014

विषबेल





       मुझे विषबेल
क्यों समझ लिया
माँ
मैं तो एक
कोंपल थी
तेरे ही तन की
क्यूं उखाड़ फेंका
फिर मुझे तूने
माँ
क्या तुझे मैं
लगी विषबेल सी
मैं तो तेरे ही
अंतर में उपजी
तेरे ही जैसी
तेरा ही रूप थी
माँ
जब जब मैंने
तेरी कोख में
आने की कोशिश की
तूने क्यूं मुझे
उखाड़ फेंका
माँ
एक बार
बाहरआने का 
मौका दे कर 
तो देखती
माँ
मुझ से ज्यादा
तेरा दर्द
कोई न समझता
माँ
क्योंकि जब जब
मुझे उखाड़ा गया
तेरी कोख से
जितना दर्द मुझे हुआ
माँ
उस से कहीं 
ज्यादा दर्द
तुझे हुआ था
माँ
मेरे आंसू तो
बह ही नही पाये
लेकिन तूने
छिप छिप कर
जाने कितने तकिये
भिगोये थे
माँ
एक बार बस
हिम्मत कर के
देखती तो 
माँ
ये विषबेल
तेरी अमरबेल
बन जाती
माँ

28 comments:

  1. Replies
    1. आभार निवेदिता जी

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    2. आप की सोच आज "संकलन" में ... आभार !

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    3. आभार निवेदिता जी

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  2. बहोत ही मार्मिक निःशब्द हूँ मै

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन सीट ब्लेट पहनो और दुआ ले लो - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. आभार ब्लाग बुलेटिन जी

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    1. आभार सुशील कुमार जी

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  5. बहुत मार्मिक .......... उफ़्फ़ !!
    एक सलाह माने, ऐसे चित्र से परहेज करें !!
    मानवता को मारें नहीं !!

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    1. आभार मुकेश कुमार जी..

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  6. बहुत मार्मिक ..........

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    1. आभार संजय भास्कर जी

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  7. मार्मिक निशब्द

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  8. आपकी इस उत्कृष्ट अभिव्यक्ति की चर्चा कल रविवार (11-05-2014) को ''ये प्यार सा रिश्ता'' (चर्चा मंच 1609) पर भी होगी
    --
    आप ज़रूर इस ब्लॉग पे नज़र डालें
    सादर

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    1. आभार अभिषेक कुमार अभी... जरूर

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  9. उफ़्फ ! ये चित्र और ये शब्द कैसे ग्रहण करूँ - स्तब्ध हूँ !

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    1. आभार प्रतिभा सक्सेना जी

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  10. Replies
    1. हार्दिक आभार प्रतिभा जी

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  11. मार्मिक रचना

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  12. हिम्मत करके देखती तो ये विषबेल अमरबेल बन जाती। मार्मिक।

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  13. Replies
    1. आभार कालीपद जी

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