Sunday, October 7, 2012

चांदनी

साथ

चांदनी रात थी

तुम मेरे साथ थी

तब चांदनी तुम थी

आज बस चांदनी है

तुम कहीं नहीं

चाँद भी अकेला है

मै भी अकेला हूँ

मै उसका दर्द समझ गया

मेरा किसी ने न समझा

काश चाँद को मिल जाए

उसकी चांदनी

किसी को तो ख़ुशी मिले

मै चकोर बन कर जी लूँगा

तुम मेरा चाँद बन जाना 

12 comments:

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    1. आभार गौरी बिटिया

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  2. चाँद रात और मैं .......बहुत बहुत सुंदर

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    1. आभार उपासना सखी

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    1. आभार सुनीता जी

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  4. तब चांदनी तुम थी
    बस आज चांदनी है......
    मैं चकोर बनकर जी लूंगा
    तुम मेरा चांद बन जाना !!!
    बहुत ही भावुक पंक्तियां. पूरी पंक्तियां विरह के मर्म को, दर्द को, विरहाग्नि को परिभाषित करती हुईं. बहुत गंभीर और जितनी स्वतः उतनी सुन्दर पंक्तियां. बधाई.

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    1. सादर आभार ऋतुपर्ण जी

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