Sunday, August 12, 2012

जिंदगी के पन्ने

पन्ने

ख्यालों की अलमारी पर ताला लगा था

जिंदगी के पन्ने यूँ ही  बेतातीब फ़ैल गये

किसी ने समझा उनका मोल

कोई न आया समेटने उनको

सब भीगते  रहे दिल की बरसातो में

जब आई किसी को याद उनकी

समझे बारिश में भीगे  गये हैं

कोई न जाना वो आंसू थे या बारिश

जितने पड़े गये तुमसे उतने  ही समझ लो

जो बह गया वो बीत गया जान लो

जो पड़ लिया वो ही बाकि रह गया

यही जिंदगी का दस्तूर है

जो समझ गया वो जीत गया

जो न समझा वो पीछे रह गया


6 comments:

  1. Very good and well expressed. It has a very deep meaning behind it.

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  2. jindgi ke panne koi padhta hai aur koi padhkar bhi nahi padhna chahta ....bahut badhiya rama sakhi

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    1. आभार उपासना सखी ...

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  3. Beautiful writing and beautiful presentation Ramaajay ji. Happy Independence Day to you too:)

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    1. धन्यवाद संजय जी .....आप को भी बधाई ....

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