Sunday, July 8, 2012

मेरी आशा

दिल

तेरी चाहत में दिल हैरान सा है

लबों पर मुस्कराहट

दिल बेचैन सा है

कौन सा लम्हा है ऐसा

जब न तुझे याद किया

जुबान खामोश रही

आँखों ने बोलना चाहा

तुम बस चेहरा देखते रहे मेरा

काश नैनो की भाषा पड़ लेते

तो आज हालत मेरी कुछ और होती

आँखे बोलती या न बोलती फिर

लेकिन जुबान कभी न खामोश होती

दे दो मेरी जुबान को बोल

पड़ लो मेरे नैनो की भाषा

बस यही तमन्ना है मेरी

कर दो पूरी मेरी आशा 

5 comments:

  1. बहुत अच्छा लिखा और कहा भी ........!

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    1. आभार उपासना सखी

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  2. बहुत सुंदर रचना.... अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया...!!

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    1. हार्दिक आभार संजय जी

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  3. Jo naino ki bhasha samjh gya use adhro ki bhasha ki jrurat nahi...aur insaan wahi jo naino ki bhasha pad le...
    adhro ki bhasha to har koi samjh leta hai....

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