Monday, March 12, 2012

मेरा गावं

वो गाँव का पनघट 
वो नदी का किनारा 
वो नहाती हुई गायें 
वो कपडे धोती हुई 
सखियाँ मेरी 
वो पेड़ो पर देखो 
अब भी लटकता 
झुला हमारा 
वो खेतो की हरयाली
वो सरसों के फूल 
वो चिड़ियों का 
चिक चिक करना 
शोर काँव काँव का 
वो बच्चों का खेलना 
और हमारा उन्हें डांटना 
कितना सुखद 
कितना प्यारा था सब 
याद है अब भी 
वो गांव का कुँवा
वो ठंडा पानी 
वो मेरा तरसते  हुए 
सब को देखना 
अब सब है कहाँ 
बस अब यादें हैं 
ना जाने कहाँ गया 
वो मेरा छोटा सा गावं 

10 comments:

  1. आप की कविता बहूत निर्मल है

    पड़ते ही मेरा हरियाली भरा गाँव की याद आगया

    दुबई की ऊँची इमारतें और विशाल रेगिस्तान

    कभी दिल में समाया नहीं है ,

    मेरा बचपन और मेरा गाँव यादें

    हमेशा दिल को सवारते है !

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    1. Dhanyawad aap ka Chandrodayam ji.....In Imarto me kho gaye kahin hum.....aap ki srahna ka Dhanyawad

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  2. theek kaha aap ne Chandrodayam ji.....Imarto me kho gaya hai hamara asli Vayaktitve...Dhanywad aap ka....or aap ki srahna ka...

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  3. अब सब है कहाँ
    बस अब यादें हैं
    ना जाने कहाँ गया
    वो मेरा छोटा सा गावं .............bahut khoob sakhi

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  4. bahut hi sundar chitra khincha hai aapne rama ji...
    gaon to wahin hai... lekin kya hum gaon me hain?.. ye prashn bada kachotataa hai ... shayad gaon bhi prashn kar raha ho " kahan gaya wo pravesh / rama ?"

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  5. Theek kaha aap ne Pravesh ji.....or sahi socha ...ki yahi prashn gaon bhi kar raha ho shayad.....Hardik Dhanyawad srahna ka

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  6. आह ! रमा जी आपने तो बचपन की सुनहरी यादों को पुन सामने ला दिया ।

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  7. हार्दिक धन्यवाद प्रवीणा सखी......

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  8. बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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