दिल की बातें
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Monday, July 9, 2012
चश्मा
चश्मा
सच्चे दोस्त की पहचान
बहुत मुश्किल हो गयी है
शायद अपनी ही नज़र
बहुत कमजोर हो गयी है
चश्मा लगा कर दुनियादारी का
देखना पड़ेगा अब सब को
बिना इस चश्मे के तो
हर चीज़ बहुत दूर हो गयी है
कहाँ बनेगा ऐसा चश्मा
ऐसी दुकाने अब तो दूर दूर हो गयी हैं
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