Sunday, November 1, 2015

कांव कांव




    कांव कांव कांव कांव
हर तरफ बस कांव कांव
जिसकी न सुनो उसकी कांव कांव
गर सुन लो तो दूसरों की कांव कांव
मान लो तो कांव कांव
न मानो तो कांव कांव
चहचहाना भूल गये सब
बस कांव कांव ही रह गया दुनिया में
वो समय कहाँ गया
जब सब चहचहाते थे और
कांव कांव से दूर भागते थे
सब परिंदे चहकते थे
हर एक की मधुर बोली थी
अब सब की एक ही बोली है
कांव कांव कांव कांव
चाहे मज़दूर हो चाहे मालिक
चाहे पति हो चाहे पत्नि
चाहे लीडर हो चाहे वोटर
चारों ओर बस कांव कांव

4 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, रामायण और पप्पू - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. सुन्दर प्रस्तुति , बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत बधाई आपको . कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |

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    1. हार्दिक आभार मदन मोहन जी

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