Sunday, March 25, 2012

लाली

 
लाली
लाली इस नाम को सुनते ही होंठो पर बरबस मुस्कुराहट आ जाती है । लाली हमारी गली का कूड़ा उठाने वाली की बेटी , मेरी हम उमर ही रही होगी लगभग , थोड़ा बहुत कम ज़ियादा हो सकता है । जिस दिन उसकी माँ की तबीयत खराब होती तो लाली आ जाती अपनी माँ की जगह काम करने, बस उसे देख कर मेरी बाँछे खिल जाती , आंखो ही आंखो मे इशारा हो जाता ताकि माँ को पता ना चले वरना पिटाई हो जाती थी मेरी । मुझे कभी समझ नही आया था कि मुझे लाली से क्यों खेलने नही देते हैं, बस उसकी फ्राक कुछ पुरानी होती थी और कुछ कुछ फटी भी , लेकिन उससे क्या होता है , वो है तो कितनी अच्छी , मुझ से डाँट भी खा लेती थी और बाकी सब की तरह लड़ती भी नही थी , उसे मैं जान कर हरा देती बस कुछ उदास होती फिर झट ही मुस्कुराने लगती ना कि बाकि सब की तरह या तो कट्टी करती या माँ को शिकायत लगाती, वो ऐसा कुछ नही करती थी , उसके चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान हमेशा रहती थी चाहे खेलते हुए हम पकड़ी जाएं ड़ाँट वोही खाती थी चुपचाप , कभी मेरा नाम नही लेती थी कि मैने बुलाया है उसे खेलने के लिये ।
जिस दिन लाली आती , वो दोपहर कितनी मजे़दार हो जाती, कड़कती गर्मी मे जब माँ हम सब भाई बहनो को सुला कर खुद भी सोती तो मैं चुपके से उठती और धीरे से चिटकनी खोल कर बाहर आ जाती फिर सामने वाले पेड़ के नीचे हम दोनो कई खेल खेलती , वो कभी नही रूठती थी ।
कई बार माँ की आंख खुलती तो कमरे में मुझे ना देख वो समझ जाती थी कि मैं कहां होऊंगी, बस चुपके से पीछे आ कर खड़ी हो जाती और लाली का उतरा हुआ चेहरा देख कर मैं पलटती तो माँ की लाल आंखे देख कर सहम जाती और झट से लाली का नाम लगा देती कि इसने खेलने बुलाया था वो आंखो में आंसू भरे माँ की डांट खा कर चली जाती , मेरी चुटिया खींचते हुए माँ मुझे कमरे मे ला कर खूब डांटती कि कितनी बार मना किया है उस के साथ खेलने को , मुझे कभी समझ नही आई थी माँ की बाते , माँ तो कभी गुस्सा नही करती थी पर लाली के साथ खेलते देख माँ को क्या हो जाता है, कुछ दिन बाद मैंने सुना माँ बाबू जी को बता रही थी कि लाली की शादी हो गयी है , मै डर के मारे पूछ भी नही सकी कि शादी तो बड़ो की होती है और लाली तो अभी फ्राक डालती थी और मेरी उम्र की थी , मन ही मन मै सोच रही थी कि मैं तो अभी दस साल की हूँ फिर कैसे , दिल से आवाज़ आई कि माँ को गलती लगी होगी लेकिन लाली अब आती नही थी , मै हर उसकी इंतज़ार करती करती दस से पंद्रह की हो गयी और एक दिन अचानक लाली आ गई लेकिन ये तो कोई और ही थी मेरी लाली नही, कैसे बिखरे से बाल थे उसके , फटी सी कोई साड़ी डाली हुई थी और..... कमर पर एक अधनंगा सा बच्चा लटकाती सभंालती हुई सी, मैं हैरान रह गई उसको देखकर अब खेलने का भी मन नही किया बस छिप कर किवाड़ से झांकती रही कि ये क्या मेरी लाली है, कौतुहल से भरी आंखो से देखती रही उसे और सोचती रही.........

10 comments:

  1. बहुत खूब चित्रण है सखी बाल मन का जो कोई भी भेद भाव नहीं समझता बस प्यार ही समझता है .............और ना जाने कितनी लाली है जो अपने बचपन की खुशियों से मरहूम है और हाँ ना जाने क्यूँ नहीं उनके लिए कर पाते ..........

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    1. सही कहा उपासना सखी..... धन्यवाद प्रोत्साहन के लिये.....

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  2. सुन्दर प्रस्तुति ....

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    1. धन्वाद अनिता सखी.....

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  3. रोज ना जाने लितनी ही लालियों के संग ऐसा होता होगा...है ना...कोई सह्रदय हो तो भीग ही जाता है....!!

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    1. ठीक कहा आपने राजीव जी.... धन्यावाद....

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  4. वाह बहुत उम्दा प्रस्तुति!
    अब शायद 3-4 दिन किसी भी ब्लॉग पर आना न हो पाये!
    उत्तराखण्ड सरकार में दायित्व पाने के लिए भाग-दौड़ में लगा हूँ!
    बृहस्पतिवार-शुक्रवार को दिल्ली में ही रहूँगा!

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    1. Hardik Dhanywad Dr Roopchander ji......khushi khushi jayiye or jaldi aaiye

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  5. उफफफफफफफफफ्फ़ रमा!!!! बेहद खूबसूरत लिखती हो तुम कैसे उडेल देती हो दिल की भावनाओं को... ढाल देती हो शब्दों में... सच कुछ देर के लिए झंझोड़ सा देती हैं तुम्हारी पंक्तियाँ ..सोचने पर मजबूर कर देती हैं ..ऐसे ही खूबसूरत लिखती जाओ बहुत कामयाब हो माँ सरस्वती तुम पर सदा मेहरबान रहे...

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    1. हार्दिक आभार दिलीप भाई

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