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Wednesday, May 30, 2012

शकुंतला

शकुतला 
देखो आज फिर श्रृंगार किया मैंने 

बिंदिया भी लगायी उम्मीद की 

पायल भी पहनी इंतज़ार भरी 

चूडियाँ भी पहनी सपनो की 

महावर  भी लगायी सुहाग वाली 

आईना भी देखा तुम्हारी तस्वीर का 

देखो झुमके भी पहने हैं प्यार भरे 

क्या ये मेरा श्रृंगार नहीं देखोगे 

क्या ये इंतज़ार कभी रंग नहीं लाएगा 

क्या मेरा प्यार तुम्हे कभी याद नहीं आएगा 

क्या मै शकुंतला बन कर रह जाउंगी 

क्या तुम भी दुष्यंत बन गए हो 

मेरे पास तुम्हारे प्यार की अंगूठी है 

क्या उसे पहचान पाओगे तुम 

कब याद आएगी तुम्हे मेरी 

कब लेकर जाओगे मेरी डोली 

कब तक यूँ ही सजती रहूंगी मै 

कब तक इंतज़ार करुँगी मै 

अब सब हँसते हैं मेरे श्रृंगार पर 

इसका मान रख लो अब 

देखो महावर के रंग सुख चले हैं 

पायल के घुंघरू भी टूटने लगे हैं 

बिंदिया भी फीकी हो चली है 

आईने पर धुल जम गयी उम्मीदों की 

झुमको की चमक धुंधली हो हो गयी 

मेरे दुष्यंत अब तो पहचानो 

मेरे प्यार की अंगूठी को 

 ले जाओ अपनी शकुंतला को 

तुम्हारे इंतज़ार में बैठी है अब तक 

तुम्हारी शकुंतला 






6 comments:

  1. अंतर्सम्वेदना से निकले शब्द लगता है बोल रहे हैं - खुद की ये चार पंक्तियों की याद आयी -

    कई लोगों को देखा है, जो छुपकर के गजल गाते
    बहुत हैं लोग दुनियाँ में, जो गिरकर के संभल जाते
    इसी सावन में अपना घर जला है क्या कहूँ यारो
    नहीं रोता हूँ फिर भी आँख से, आँसू निकल आते

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    http://www.manoramsuman.blogspot.com
    http://meraayeena.blogspot.com/
    http://maithilbhooshan.blogspot.com/

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  2. मर्मस्पर्शी रचना.....

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  3. ... बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति है ।

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    1. हार्दिक आभार संजय जी ,,,,,आप का ब्लॉग पर आना .....

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